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जनता इतिहास और सत्ता

सैकड़ों वर्षों से विश्वभर मे सत्ता करने की ताकत कभी भी सर्वसाधारण जनता से नहीं आई थी| गणतंत्र की अवधारणा का प्रादुर्भाव सहस्त्र वर्षों पुराना है | परंतु उसकी सामान्य लोगों तक पहुँच नहीं थी| हजारों , लाखों या करोड़ों की भीड़ केवल राजा या प्रधान की सेवा हेतु समझी जाती थी| राज्य की शक्तियों का केंद्र केवल मुट्ठीभर लोगों या कुछ विशेष समुदायों तक सीमित रहा था | हम भारत के निकट इतिहास को देखे तो इसकी पुष्टि हो जाती है |गणतांत्रिक भारत के गत 75 वर्षों से पहले तक किसी भी राजनैतिक इकाई की सम्पूर्ण शक्ति किसी एक व्यक्ति में निहित होती थी| जब विभाजन का प्रस्ताव लंदन मे पारित हुआ तो उसके महत्वपूर्ण बिन्दु थे(1)ब्रिटिश द्वारा प्रत्यक्ष रूप से शासित क्षेत्रों का धर्म आधारित बंटवारा (2)शेष क्षेत्रों के सैकड़ों राजा स्वयं यह निर्णय करें की उन्हे स्वतंत्र रहना है या भारत या पाकिस्तान मे विलयित होना है | समानता ,बंधुता ,मानवता और न्याय की ड़ींगे हाँकने वाले अंग्रेज ,राजाओ द्वारा शासित क्षेत्रों की जनता के अधिकारों को अपनी नीति में शामिल नहीं कर सके |करते भी क्यूँ “अधिकार” शब्द सामान्य जनता का तक तक था ही नहीं |अंग्रेजों ने भारत पर आधिपत्य जनता से नहीं लिया था |1798 में हैदराबाद के निजाम से शुरू हुए “सहयोग समझौते” भारत के राजाओं के लिए तो संधि मात्र थी , जो उन्हे अपनी सत्ता पर यद्यपि कुछ शर्तों के साथ रहने की अनुमति प्रदान करती थी | इसकी असली मार तो शासनाधीन जनता पर पड़ी |दोहरी कर वसूली हो या सीधा शासन , जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ता ही चला गया|बेहद बेतुके करो की मार पड़ी ,सूखा और अकाल पड़ा पर उनके शासकों पर इसका प्रभाव न पड़ा|स्वयं को ईश्वर के प्रतिनिधि बताने वाले राजा अपनी निजी भोग के लिए अधिकतम कर वसूलते |राजाओं को कर का एक हिस्सा उनके “सहयोगी” और “माई बाप “ अंग्रेजों को भी तो देना होता था | 1857 की क्रांति भारत की स्वतंत्रता की ओर पहला सशक्त कदम माना जाता है |यह अंतिम लड़ाई थी जो भारतीयों ने अपने बलबूते एवं शर्तों पर लड़ी|पर क्या लड़ने वाले “भारतीय” थे ?उन्होंने शायद एक संगठित भारत की परिकल्पना तक नहीं करी होगी| उनका संघर्ष निसंदेह अंग्रेजों के विरुद्ध था ,परंतु क्या वे देश की आम जनता के लिए लड़ रहे थे ? निश्चित रूप से नहीं ,अधिकतर सिर्फ अपनी जागीरों के लिए लड़ रहे थे| वे असन्तुष्ट थे , अंग्रेजों की नीतियों से |उन्हे उनकी सत्ता ,जागीरों , राज्यों से हटा दिया गया था |वे जागीरे जिन्हे वे अपनी “जन्म आधारित” निजी संपति समझते थे |उनकी जागीरों के गरीब असहाय लोगों की पीड़ा उनका बिन्दु नहीं था| लगभग एक-सवा साल के संघर्ष के उपरांत अंग्रेजों ने सारे “सेनानियों”को पराजित कर दिया|हम लड़ने वाले राजाओ,जागीरदारों के नाम तो हम गर्व से लेते है , परंतु उन्हे हराया किसने? इसी देश के शेष राजाओ ने ,जिन्होंने “सहयोगी” होने के अपने संधिबद्ध नियम का पालन किया|संघर्षों को कुचलने के लिए आमेर,ग्वालियर, हैदराबाद और पटियाला जैसे राजघरानों ने अपने संसाधन अंग्रेजों को दिए |यदि हम लड़ने वालों को “स्वातंत्रय सेनानी” माने तो उन्हे कुचलने वालों को क्या संज्ञा दे ?यदि कोई संघर्ष खत्म किया गया तो कैसे ?केवल “अंग्रेजी सेना” को कोसना कितना सही होगा? ऐसी सेना जिसका अर्धाधिक भाग तो इसी देश के थे| भीषण संघर्ष को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने दरबार लगाया | उन्होंने सैकड़ों लोगों को तोपों से उड़ा दिया , हजारों को फांसी पर लटका दिया|फिर अपने प्रशासनिक तंत्र का मूल्यांकन किया |इतना लड़ने पर अंग्रेज समझ चुके थे कि यहाँ शासन करने के लिए ,रजवाड़ों और रियासतों से निरंतर संघर्ष संभव नहीं है | अंततः नीति बनायी गई कि “अंग्रेजों की स्वयं हत्या करने वालों” को छोड़कर , शेष सभी को एकमुश्त माफीनामा दे दिया गया |यह सुझाया गया की “भारतीय राजाओ “ की मर्यादा एवं सम्मान का अच्छे से ध्यान रखा जाएगा |

यहाँ जनता से कोई सरोकार नहीं था|

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हम मिले तुम मिले

 तुम चलो हम चलें ,फिर मिले कब मिले ! वक्त की कतार में, भ्रम सी मझधार में हम चलें कब चलें ,तुम मिलो हम मिले | बात है यह राज की, कब चलें और कब जुड़े? वक्त जो गुजर गया, स्वप्न जो बिखर गया, टूटे हैं भ्रम जो, वक्त में मिलन हुआ| रात सी जो बात थी, बात की न बात थी, न फिर मिले ,न फिर जुड़े | वक्त की मार से, न तुम मिले ना हम मिले मेघ भी गरज उठे, वक्त भी मचल उठा , जब ना तुम हमसे मिले यह विचार भी अनाचार था, जब वक्त भी शर्मसार था,  हर कदम हम चले, ना तुम मिले ना हम मिले, हां,यह भ्रम था अब जो ना रहा, कि कब मिले और कब जुड़े, हम मिले तुम मिले, तुम मिलो हम मिले !!!

रात का दम्भ

ये दम्भ है , रात का काली , भयानक , अंधकार वाली | मैं कर दूँ , निस्तब्ध काल को , मायूसी है तांडव सी , मरणशय्या तैयार है || है क्यूँ तैयार काल , निगलने को चलता है , समय का चक्र निरंकुश | पहर गुजरता नहीं , डराती है आधी रात , हाँ , मैं रात हूँ , मौत वाली || वर्तमान गुजर रहा , भूत चला गया , मैं अभिमान हूँ , भविष्य के आने का | हरेक को तलाश है , मेरे आकर जाने की मेरा स्वरूप , तैनात हूँ ,वक्त को बदलने को || मैं ताक़त हूँ , सत्ता बदलने की , अन्याय की , अविश्वास की | मै रास्ता हूँ , पथरीला , कंटीला , चुभता हूँ मौत सा |